Saturday, 30 January 2021

कहानी गोविंद देव जी की

Shri Radha Govind Dev Ji


जयपुर। पांच हजार साल पहले भगवान श्री कृष्ण के प्रपोत्र व मथुरा नरेश ब्रजनाभ की बनवाई गई गोविंद देवजी की मूर्ति ने जयपुर को भी वृंदावन बना दिया। राधारानी और दो सखियों के संग विराजे गोविंददेव जी को कनक वृंदावन से सिटी पैलेस परिसर के सूरज महल में विराजमान किया गया। औरंगजेब के दौर में देवालयों को तोडऩे के दौरान चैतन्य महाप्रभु के शिष्य शिवराम गोस्वामी राधा गोविंद को वृंदावन से बैलगाड़ी में बैठाकर सबसे पहले सांगानेर के गोविंदपुरा पहुंचे थे।

आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में राधा गोविंद का भव्य मंदिर बनवाने के बाद गोविंदपुरा को गोविंददेवजी की जागीर में दे दिया था। जयसिंह द्वितीय ने जयपुर बसाया तब राधा गोविंद जी को सिटी पैलेस के सूरज महल में ले आए। राधा गोविंद देव जी के वृंदावन से जयपुर में विराजमान होने के बाद ब्रज क्षेत्र में राधा कृष्ण की भक्ति का प्रचार करने वाले कई सम्प्रदायों के पीठ भी यहां आ गए।

Shri Radha Govind Dev Ji

 

मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में बनवाया मंदिर
करीब पांच हजार साल पहले बनी गोविंददेवजी और पुरानी बस्ती की गोपीनाथजी की मूर्तियों को करीब 480 साल पहले चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी आदि ने वृंदावन के गोमा टीले में से निकाला था। आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में मंदिर बनवाया। मंदिर निर्माण के लिए आमेर से कल्याणदास, माणिकचन्द चौपड़ा, विमलदास आदि कारीगरों को वृंदावन भेजा गया। राधा रानी को भी उड़ीसा से लाकर गोविंद के साथ विराजित किया गया। गोविंद के जयपुर आने पर राधा माधव गौड़ीय परम्परा में राधा दामोदर और गोपीनाथजी आदि के मंदिर बने जिनमें गोविंद भक्ति की रसधारा बहने लगी।


विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में
देवर्षि कलानाथ शास्त्री के मुताबिक चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के संत जयपुर को दूसरा वृंदावन भी मानते हैं। निम्बार्क संतों ने परशुरामद्वारा को निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ बनाया। ब्रह्मपुरी में गोकुलनाथ जी मंदिर और परशुरामद्वारा में बलदेव कृष्ण का मंदिर निम्बार्क सम्प्रदाय का है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने निम्बार्क आचार्यो की सलाह पर विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में सम्पन्न कराया।

वृंदावन से आई लाडलीजी

श्रीनाथजी का बल्लभ सम्प्रदाय, हित हरिवंशीय समाज, शुक व ललित सम्प्रदाय की परम्परा के संतों ने राधा कृष्ण भक्ति की अलख जगाई। आठ प्रिय सखियों संग वृंदावन से आई लाडलीजी (राधारानी) का रामगंज में मंदिर बना। भागवत पुराण में नंदबाबा के संग श्री कृष्ण के आमेर में अम्बिका वन आने के प्रसंग ने भी जयपुर में कृष्ण भक्ति को बढ़ाया।

 

मीरा की कृष्ण प्रतिमा की जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना
चितौडगढ़ के किले में मीरा की कृष्ण प्रतिमा को वर्ष 1656 में आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना से भी कृष्ण भक्ति ऊंचाइयों पर पहुंची। पंडित युगल किशोर शास्त्री के प्रेम भाया मंडल के ढूढाड़ी भजन आज भी बुजुर्गो की जबान पर है।

story nahargarh fort

भूत के खौफ से रुक गया था इस किले का काम, खास रानियों के लिए बने थे कमरे

आत्मा ने रोका था किले का काम...
- कहा जाता है कि किले के निर्माण के दौरान अजीब घटनाएं सामने आ रहीं थी। हर दूसरे दिन मजदूरों को अपना काम बिगड़ा हुआ मिलता था।
- इसके बाद पता करने पर जानकारी मिली कि य़ह जगह राठौर राजा नाहर सिंह भोमिया की थी। लोगों का मानना था कि उनकी आत्मा की वजह से निर्माण में इस तरह की दिक्कतें सामने आ रही थी।
- जिसके बाद सवाई राजा मान सिंह ने पास के पुराना घाट पर उनके लिए एक छोटा सा महल बनवाया। नाहर सिंह की आत्मा को जगह मिलने के बाद महल के निर्माण में कभी भी गड़बड़ी नहीं आई।
- इस किले का पहले नाम सुदर्शनगढ़ था, लेकिन राठौर राजा नाहर सिंह भोमिया की आत्मा का किस्सा आने के बाद इसका नाम बदलकर नाहरगढ़ कर दिया गया।

अकबर के नौ रत्नों में एक ने बनवाया था ये महल

- अकबर के नौरत्नों में से एक रहे महाराजा मान सिंह ने नाहरगढ़ किले का निर्माण करवाया था। महाराजा मान सिंह ने ही जयपुर की स्थापना भी की थी। सन् 1734 ईसवीं में इस किले का निर्माण करवाया गया।
- अरावली की पहाड़ियों पर बना यह किला आमेर और जयगढ़ किले के साथ मिलकर जयपुर शहर को सुरक्षा देने के हिसाब से बनवाया गया था। इस किले में आमिर खान से लेकर सुशांत सिंह राजपूत की फिल्में शूट हो चुकी हैं।

रानियों के लिए करवाया था शाही भवनों का निर्माण

- राजा मान सिंह की कई रानियां थी, यही वजह थी कि उन्होंने सभी रानियों के लिए शाही कमरे बनवाए थे।
- इसके लिए खास तौर पर आर्किटेक्ट को निर्देश दिए गए थे। इसे बनाने का श्रेय जयधर भट्टाचार्य को जाता है जिन्होंने रानियों ने के भवन का निर्माण किया था।
- रानियों के लिए मानवेन्द्र भवन में एक जैसे कई शाही कमरे बनवाए गए थे। जिनमें टॉयलेट से लेकर किचन तक ही व्यवस्था दी गई थी।

जानवरों का खतरा

इस किले के पीछे काफी बड़ा जंगल है। बताया जाता है कि राजा मानसिंह जंगल का इस्तेमाल शिकार के लिए करते थे। आज भी यहां कई जंगली जानवर मौजूद हैं। यही कारण है कि यहां पर्यटकों को दिन में भी महल या केसर क्यारी(किले का हिस्सा) के आस-पास नहीं घूमने देते।

कहानी सारंगपुर हनुमानजी की

इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव

kashtbhanjan hanuman mandir sarangpur

इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव

शनि देव को सबसे क्रोधित देवता माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी बुरी दृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ जाए तो उसके जीवन में परेशानियां आने लगती है। हमारे हिन्दू ग्रंथों में माना गया है जो भी व्यक्ति भगवान हनुमान जी की भक्ति करता है, उस पर शनि देव का प्रकोप नहीं रहता है। कहा जाता है कि महाबली हनुमान के आगे शनि देव भी कुछ नहीं कर पाते हैं।

आज हम आपको ऐसा मंदिर के बारे में बताएंगे जहां शनि देव महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं। अब सवाल ये भी उठता है कि आखिर वह कौन सा कारण था कि शनि देव को नारी रूप धारण करना पड़ा और महाबली हनुमान जी को चरणों में बैठना पड़ा? भारत में ऐसा मंदिर कहा है? तो अइये जानते हैं....

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार धरती पर शनि देव प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। शनि देव की बुरी दृष्टि से मानव तो मानव देवता भी बहुत परेशान हो गए थे। इसके बाद सभी ने शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए महाबली हनुमान जी को याद किया और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। भक्तों की गुहार पर हनुमान जी ने शनि देव को सजा देने के लिए निकल पड़े।

जब इस बात की जानकारी शनि देव को लगी तो वो भयभीत हो गए। क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी के गुस्से से कोई रक्षा नहीं कर पाएगा। कथाओं के अनुसार, शनि देव हनुमान जी के गुस्से बचने के लिए उपाय निकाला और नारी का रूप धारण कर लिया।

सभी जानते हैं कि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और वे किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठाते, ना ही बुरा बर्ताव करते। बस यही सोच कर शनि देव ने हनुमान जी से बचने के लिए नारी का रूप धराण कर लिए और भगवान हनुमान से उनके चरणों में शरण मांग ली। हनुमान जी को इस बात की जानकारी हो गई थी शनि देव ही स्त्री का रूप धारण किए हुए हैं। इसके बावजूद हनुमान जी ने शनि देव को नारी रूप में माफ कर दिया। उसके बाद शनि देव ने हनुमान जी के भक्तों पर से अपना प्रकोप हटा लिया।

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गुजरात के भावनगर में है मंदिर

ऐसा मंदिर गुजरात के भावनगर स्थि सारंगपुर गांव में है। इस प्रचीन हनुमान मंदिर को कष्टभंजन हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में हनुमान जी का दर्शन करने आता है और भक्ति करता है, उसके ऊपर से शनि देव का प्रकोप दूर हो जाता है। माना ये भी जाता है कि शनिदेव हनुमान जी के भक्तों को कभी परेशान नहीं करते हैं।

Wednesday, 27 January 2021

पांडुपोल हनुमान मंदिर की कहानी

पांडुपोल हनुमान : अलवर में हनुमान ने भीम को दिए थे दर्शन, भीम ने गदा के प्रहार से तोड़ डाला था पहाड़

Pandupol Hanuman Temple : Bheem And Hanuman Story In Hindi

आज पांडुपोल हनुमान का मेला है, यहीं पर ही हनुमानजी ने भीम को दर्शन दिए थे।

अलवर. Pandupol Hanuman Temple : Bheem And Hanuman Story In Hindi
अलवर जिले के ( Sariska Tiger Reserve ) सरिस्का बाघ परियोजना के अंर्तगत ( Pandupol Hanuman ) पांडुपोल हनुमान जी लक्खी मेला शुरु हो गया है। वहीं मंदिर में मुख्य भर मेला मंगलवार को है। ( Pandupol Temple ) पांडूपोल हनुमान मंदिर में लक्खी मेले के अवसर पर करीब 50 हजार श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। पांडूपोल हनुमान मंदिर अलवर शहर के करीब 55 किलोमीटर दूर है। सरिस्का के बीचों-बीच स्थित इस हनुमान मंदिर का इतिहास महाभारत काल से है। किवदंती है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान भीम ने अपनी गदा से पहाड़ में प्रहार किया था, गदा के एक वार से पहाड़ टूट गया और पांडवों के लिए रास्ता बन गया।

बजरंग बली ने भीम को दिए थे दर्शन

पांडूपोल में बजरंग बली ने भीम को दर्शन दिए थे। महाभारत काल की एक घटना के अनुसार इसी अवधि में द्रौपदी अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार इसी घाटी के नीचे की ओर नाले के जलाशय पर स्नान करने गई थी । एक दिन स्नान करते समय नाले में ऊपर से जल में बहता हुआ एक सुन्दर पुष्प आया द्रोपदी ने उस पुष्प को प्राप्त कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उसे अपने कानों के कुण्डलों में धारण करने की सोची। स्नान के बाद द्रोपदी ने महाबली भीम को वह पुष्प लाने को कहा तो महाबली भीम पुष्प की खोज करता हुआ जलधारा की ओर बढऩे लगा। आगे जाने पर महाबली भीम ने देखा की एक वृद्ध विशाल वानर अपनी पूंछ फैला आराम से लेटा हुआ था। वानर के लेटने से रास्ता पूर्णतया अवरुद्ध था ।

यहां संकरी घाटी होने के कारण भीमसेन के आगे निकलने के लिए कोई ओर मार्ग नही था। भीमसेन ने मार्ग में लेटे हुए वृद्व वानर से कहा कि तुम अपनी पूंछ को रास्ते से हटाकर एक ओर कर लो तो वानर ने कहां कि मै वृद्व अवस्था में हूं। आप इसके ऊपर से चले जाएं, भीम ने कहा कि मैं इसे लांघकर नहीं जा सकता, आप पूंछ हटाएं। इस पर वानर ने कहा कि आप बलशाली दिखते हैं, आप स्वयं ही मेरी पूंछ को हटा लें। भीमसेन ने वानर की पूंछ हटाने की कोशिश की तो पूंछ भीमसेन से टस से मस भी ना हो सकी। भीमसेन की बार बार कोशिश करने के पश्चात भी भीमसेन वृद्ध वानर की पूंछ को नही हटा पाए और समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नही है ।

 

पांडुपोल हनुमान : अलवर में हनुमान ने भीम को दिए थे दर्शन, भीम ने गदा के प्रहार से तोड़ डाला था पहाड़

भीमसेन ने हाथ जोड़ कर वृद्ध वानर को अपने वास्तविक रूप प्रकट करने की विनती की । इस पर वृद्ध वानर ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर अपना परिचय हनुमान के रूप में दिया । भीमसेन ने सभी पांडव को वहां बुला कर वृद्ध वानर की लेटे हुए रूप में ही पूजा अर्चना की। इसके बाद पांडवों ने वहां हनुमान मंदिर की स्थापना की जो आज पांडुपोल हनुमान मंदिर नाम से मशहूर है। अब हर मंगलवार व शनिवार को यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, मंदिर जन-जन की आस्था का केन्द्र है।

Monday, 18 January 2021

RAJA BHARATHARI STORY


पत्नी के कारण राजा बन गया था संन्यासी, छोटी सी गुफा में की थी तपस्या

6 वर्ष पहले(उस गुफा में जाने का रास्ता जहां राजा भृर्तहरि ने तपस्या की थी।)मध्यप्रदेश स्थापना दिवस विशेष: 1 नवंबर को प्रदेश का स्थापना दिवस है। इस अवसर पर प्रदेश के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, कला, विकास और सुनी-अनसुनी कहानियों से आपको अवगत कराएगा। इस कड़ी में आज हम आपको बता रहे हैं, राजा भृर्तहरि के बारे में जिन्होंने अपनी पत्नी के कारण राजपाठ छोड़ दिया था।इंदौर। उज्जैन के महाराजा भर्तृहरि के संत बनने के पीछे कई तरह की कहानियां कही-सुनी जाती हैं। दो सबसे प्रचलित कहानियों में से एक के अनुसार अपनी सबसे प्रिय रानी पिंगला की बेवफाई से खिन्न होकर उन्होंने अपना राजपाट अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को दे दिया और खुद गुरु गोरखनाथ के शिष्य बन कर संन्यास ले लिया। दूसरी कहानी के मुताबिक अपनी मृत्यु की झूठी खबर सुन कर रानी पिंगला के सती हो जाने के बाद वह गुरु गोरखनाथ की शरण में जा पहुंचे थे।

देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके बारे में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन एक बात हर जगह मानी जाती है कि कल्पवृक्ष से मिले फल को खाने के कारण वह अमर हैं और खुद से जुड़े स्थानों पर अलग-अलग रूप में अक्सर आया करते हैं। राजा भर्तृहरि को नाथ संप्रदाय के साधु और भक्त अपना देवता मानते हैं। कहा जाता है कि अलवर (राजस्थान) के भर्तृहरि धाम में सदियों से अखंड ज्योति और धूनी जल रही है। स्थानीय लोग इसे भृतहरि के उसी नाम से पुकारते हैं, जिस नाम से राजा से संत बने भर्तृहरि को जाना जाता है। यहां राजा भर्तृहरि की समाधि है और माना जाता है कि इसे ईसा से सौ साल पहले भर्तृहरि के शिष्यों और अनुयायियों ने बनवाया था।

क्या पत्नी के वियोग में हो गए थे सन्यासी


एक कथा के अनुसार भृतहरि की पत्नी पिंगला जब किसी और पुरुष से प्यार करने लगती है, भृतहरि सन्यासी बनकर राज्य छोड़कर दूर चले जाते हैं। और एक कहानी बिल्कुल इसके विपरीत है जिसमें रानी पिंगला पति से बेहद प्रेम करती है। कहानी में राजा भृतहरि एक बार शिकार खेलने गए थे। उन्होंने वहाँ देखा कि एक पत्नी ने अपने मृत पति की चिता में कूद कर अपनी जान दे दी। राजा भृतहरि बहुत ही आश्चर्य चकित हो गए उस पत्नी का प्यार देखकर। वे सोचने लगे कि क्या मेरी पत्नी भी मुझसे इतना प्यार करती है। अपने महल में वापस आकर राजा भृतहरि जब ये घटना अपनी पत्नी पिंगला से कहते हैं, पिंगला कहती है कि वह तो यह समाचार सुनने से ही मर जाएगी। चिता में कूदने के लिए भी वह जीवित नहीं रहेगी। राजा भृतहरि सोचते हैं कि वे रानी पिंगला की परीक्षा लेकर देखेंगे कि ये बात सच है कि नहीं। फिर से भृतहरि शिकार खेलने जाते हैं और वहाँ से समाचार भेजते हैं कि राजा भृतहरि की मृत्यु हो गई। ये खबर सुनते ही रानी पिंगला मर जाती है। राजा भृतहरि बिल्कुल टूट जाता है, अपने आप को दोषी ठहराते हैं और विलाप करते हैं। पर गोरखनाथ की कृपा से रानी पिंगला जीवित हो जाती है। और इस घटना के बाद राजा भृतहरि गोरखनाथ के शिष्य बनकर चले जाते हैं।

या पत्नी के बेवफाई ने बनाया गोरखनाथ का शिष्य

उज्जयिनी अब उज्जैन के नाम से जाना जाता है। यहां के राजा थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को मिला। क्योंकि भृतहरि विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भृतहरि की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भृतहरि उससे ज्यादा प्यार करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भृतहरि के आदर सत्कार से तपस्वी गुरु खुश हो गए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे। चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल पिंगला को दिया कि पिंगला यह फल खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भृतहरि ने कोतवाल को बुलवा लिया। कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भृतहरि को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भृतहरि के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भृतहरि ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी।

या फिर यह कहानी सच है
एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिए गए हुए थे। वहां काफी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति-पत्नी जब घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था। भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि महाराज, यह मृगराज 700 हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिए आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन पर बाण चला दिया। इससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा। प्राण छोड़ते-छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा, ‘तुमने यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूं उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगी बाबा को, मेरे नेत्र चंचल नारी को, मेरी त्वचा साधु-संतों को, मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे देना। मरणासन्न हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का शव घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे। रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर बाबा गोरखनाथ ने कहा- मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूं कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली। और सन्यासी हो गए।
इंद्र भी हो गए थे भयभीत
राजा भृतहरि की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भृतहरि वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भृतहरि पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भृतहरि ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भृतहरि के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भृतहरि की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भृतहरि की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।
यहां है गुफा
उज्जैन में भृतहरि की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भृतहरि ने तपस्या की थी। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भृतहरि का भतीजा था। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।
अंतिम समय राजस्थान में
राजा भर्तृहरि का अन्तिम समय राजस्थान में बीता। उनकी समाधि अलवर (राजस्थान) के जंगल में है। उसके सातवें दरवाजे पर एक अखण्ड दीपक जलता रहता है। उसे भर्तृहरि की ज्योति माना जाता है। भर्तृहरि महान शिवभक्त और सिद्ध योगी थे और अपने भाई विक्रमादित्य को पुनः स्थापित कर अमर हो गए। विक्रमादित्य उनकी तरह ही चक्रवर्ती निकले और उनके सुशासनकाल में विक्रम संवत की स्थापना हुई, जिसका शुभारंभ आज भी चैत्रमास के नवरात्र से आरंभ होता है।
विक्रमसंवत् से पहले
भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है, जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थे, अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं। फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है। पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे।

Friday, 11 December 2020

DURGAPUR HORROR STORY 1

पिछले 100 सालो से इस गांव में नहीं मनाई गई होली, बेहद डरावनी है इस गांव की कहानी

Horror story of durgapur village – झारखंड के बोकारो के पास स्थित है दुर्गापुर गांव। इस गांव की कहानी बेहद ही डरावनी है। यहां के लोगों के अंदर एक ऐसा अंधविश्वास है जो उनके दिल में दहशत पैदा कर रहा है। यहां के लोग होली का त्यौहार नहीं मनाते हैं। 100 सालों से ज़्यादा समय से इस गांव में होली का त्यौहार नहीं मनाया गया है। जब पूरा देश होली का त्यौहार मना रहा होता है, तब इस गांव के लोग दहशत में जी रहे होते हैं। तो चलिए आपको बताते हैं क्या है इसके पीछे की कहानी।

horror story of durgapur village

Horror story of Durgapur village – दुर्गापुर गांव की डरावनी कहानी

  • झारखंड के पास बसा है दुर्गापुर गांव। इस गांव के लोगों के दिल में एक डर बैठा हुआ है। इस डर के कारण यहां के लोग होली का त्यौहार नहीं मनाते। एक ओर जहां पूरे देश में होली की तैयारियां चल रही होती हैं, वहीं दुर्गापुर गांव में मनहूसियत सी छाई होती है।
  • करीब नौ हज़ार की आबादी वाले इस गांव के लोगों के दिलों में इस त्यौहार को लेकर दहशत है। यहां के लोगों का मानना है कि होली खेलने से उनके गांव में कोई न कोई मुसीबत आ जाएगी, या पूरे गांव में महामारी फैल जाएगी।
  • आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इस गांव में यह परंपरा पिछले 100 साल से भी ज़्यादा समय से चली आ रही है। इस गांव के लोग होली न मनाने के पीछे वजह बताते हैं कि उन्हें डर है कि अगर राजा के आदेशों का पालन नहीं हुआ तो उनका भूत गांव में कहर बरपा देगा।
  • दरअसल कहानी कुछ इस तरह है कि कई दशकों पहले दुर्गापुर में राजा दुर्गा प्रसाद का शासन था, उन्हें होली मनाना बेहद पसंद था। कुछ समय बाद राजा के बेटे की होली के दिन ही मौत हो गई।
  • इसके बाद से जब भी गांव में होली का आयोजन होता था तो यहां कभी भयंकर सूखा या फिर महामारी फैल जाती थी, जिसकी वजह से गांव के लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था जिससे गांव में कई लोगों की मौत हो जाती थी।

Horror story of durgapur village

  • संयोग से एक युद्ध के दौरान राजा की मौत भी होली के दिन हुई थी। कुछ रिपोर्ट्स की माने तो अपनी मौत से पहले राजा ने अपनी प्रजा को आदेश दिया था कि उसकी प्रजा कभी होली न मनाए।
  • बस तभी से इस गांव में राजा की बात का पालन किया जाता है और कोई उनकी इस बात को आज भी तोड़ने तो तैयार नहीं है इसलिए 150 साल से भी ज्यादा समय से गांव में होली नहीं मनाई जाती। गांव वाले इस आदेश को अभी भी मानते हैं।
  • गांव के लोगों का ये भी मानना है कि अगर वो राजा के आदेश का पालन नहीं करेंगे तो राजा का भूत उन्हें डराएगा और सब कुछ तहस नहस कर देगा। होली के दिन उत्सव के बजाय इस गांव की गलियां बेजान और सूनी नज़र आती है।
  • गांव में भूत का डर इतना ज़्यादा है कि आस-पास के गांव के लोग भी यहां के ग्रामीणों को होली पर न गुलाल लगाते हैं और न ही उनपर रंग फेंकते हैं।
  • गांव के लोगों की माने तो कुछ साल पहले दुर्गापुर में कुछ मछुआरे आए थे और उन्होंने परंपरा तोड़कर होली मनाई थी। इसके बाद गांव में महामारी फैल गई थी।

अब ये लोगों का अंधविश्वास है या उनकी सोच, ये तो हम नहीं बता सकते, लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी इस गांव के लोग होली का त्यौहार नहीं मनाते।

Monday, 30 November 2020

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राजस्थान के इस मंदिर में लोग जितना चढ़ाते हैं उनका खजाना उससे ज्यादा बढ़ता जाता है! कई देशों की विदेशी मुद्रा आती है भंडारे में

चित्तौडगढ़़।मेवाड़ राजपरिवार की ओर से इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। मंदिर कृष्ण धाम के रूप में सबसे ज्यादा प्रसिद्द है...

राजस्थान के चित्तौडगढ़़ जिले के प्रख्यात कृष्ण धाम ( Lord Krishna Temple ) भगवान ‘सांवलिया सेठ‘ ( Sanwaliya Seth ) के मंदिर में चतुर्दशी के अवसर पर भंडार खोला गया। भंडार से प्रथम चरण की गिनती में 3 करोड़ 33 लाख, 30 हजार, 500 रुपये की राशि प्राप्त हुई। नोटों की गिनती में मंदिर मंडल सीईओ मुकेश कुमार कलाल, लेखा अधिकारी सतीश कुमार, तहसीलदार ईश्वर लाल खटीक, मंदिर मंडल अध्यक्ष कन्हैया दास वैष्णव सहित मंदिर मंडल कर्मचारी, बैंक कर्मी उपस्थित थे। छोटे नोटों की गिनती सोमवार को होंगी। भगवान सांवलिया सेठ का जेठी अमावस्या का मासिक मेला भी शुरू हो गया है। सोमवती अमावस्या मिलने के कारण सोमवार को श्रद्धालुओं की भीड़ आने की संभावना है। सीता माता का मेला होने के कारण इस मेले में भाग लेने वाले श्रद्धालु सांवलिया जी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

 

 

Sanwaliya Seth Temple

 

चित्तौडगढ़ के मंडफिया ( Mandpiya ) स्थित श्री सांवलिया सेठ का मंदिर ( Sanwaliya Seth Temple ) करीब 450 साल पुराना है। मेवाड़ राजपरिवार की ओर से इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। मंडफिया मंदिर कृष्ण धाम के रूप में सबसे ज्यादा प्रसिद्द है। यह मंदिर चित्तौडगढ़़ रेलवे स्टेशन से 41 किमी एवं डबोक एयरपोर्ट-उदयपुर से 65 किमी की दुरी पर स्थित है। सांवलिया जी का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। मान्यता के अनुसार मंदिर में स्थित सांवलिया जी मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है जिनकी वह पूजा किया करती थी।

 

सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से ( Sanwaliya Seth Temple History )
भगवान श्री सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है जिनकी वह पूजा किया करती थी। मीरा बाई संत महात्माओं की जमात में इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। ऐसी ही एक दयाराम नामक संत की जमात थी जिनके पास ये मूर्तियां थी।

 

 

Sanwaliya Seth Temple

 

खेती से लेकर व्यापार व तनख्वाह में भी सांवलिया सेठ का हिस्सा
लोगों की सांवलिया जी को लेकर ऐसी मान्यता है जितना वे यहां चढ़ाएंगे सांवलिया सेठ उनके खजाने को उतना ज्यादा भरेंगे। ऐसे में कई लोगों ने अपने खेती से लेकर व्यापार व तनख्वाह में सांवलिया सेठ का हिस्सा रखा हुआ है। ऐसे लोग हर माह मंदिर आते हैं और उसके हिस्से की राशि चढ़ा देते हैं। यह राशि 2 से लेकर 20 फीसदी तक है।

 

विदेशों में भी है हिस्सेदार
सांवरिया सेठ मंदिर में आने वाले कई भक्त एनआरआई है। ये विदेशों में अर्जित आय से सांवरिया सेठ का हिस्सा चढ़ाते हैं। ऐसे में भारतीय रुपए के साथ अमरीकी डॉलर, पाउण्ड, रियॉल, दिनार और नाईजीरिया नीरा के साथ कई देशों की मुद्रा मंदिर के भंडारे में आती है।

Sanwaliya Seth Temple

 

हर महीने खुलता है मंदिर का भंडारा
सांवलिया सेठ जी मंदिर का भंडारा हर माह अमावस्या के 1 दिन पहले चतुर्दशी को खोला जाता है। इसके बाद अमावस्या का मेला शुरू हो जाता है। वहीं दीपावली के समय यह भंडारा दो महीने व होली के समय डेढ़ माह में खोला जाता है।

 

16 गांवों का विकास भी इसी राशि से
मंदिर में लोग रसीद कटाकर नंबर 1 में भी दान कर कर जाते हैं। यह राशि 30 से 70 लाख रूपय के बीच होती है। अधिकांश राशि सेवा कार्य में मंदिर ट्रस्ट को अर्जित होने वाली आय सेवा और विकास कार्य में उपयोग की जाती है। ट्रस्ट शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक आयोजन, विकास और मूलभूत सुविधाओं को विकसित करने में यह राशि खर्च करता है। ट्रस्ट ने मंडफिया के आसपास के 16 गांवों का विकास भी इसी राशि से करवा रहा है।

 

Sanwaliya Seth Temple

 

एक करोड़ लोग हर साल आते हैं दर्शन के लिए
सांवरिया सेठ की ऐसी मान्यता है जिसके कारण देश के कोने-कोने व विदेशों से हर साल करीब एक करोड़ लोग मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के पुजारियों के अनुसार हर माह करीब साढ़े 8 से 9 लाख के बीच श्रद्धालु मंदिर में आते हैं।

Sanwaliya Seth Temple