Sunday, 18 April 2021

story of prithvi raj chauhan

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान'


ये दोहा चंद्रवरदाई ने पृथ्वीराज चौहान को संकेत देने के लिए कहा था. जैसे ही इस दोहे को सुनकर मोहम्मद गोरी ने 'शाब्बास' बोला. वैसे हीं अपनी दोनों आंखों से अंधे हो चुके पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को अपने शब्दभेदी बाण के द्वारा मार डाला.

वहीं दुखद ये हुआ कि जैसे ही मोहम्मद गोरी मारा गया उसके बाद ही पृथ्वीराज चौहान और चंद्रवरदाई ने अपनी दुर्गति से बचने की खातिर एक-दूसरे की हत्या कर दी.  इस तरह पृथ्वीराज ने अपने अपमान का बदला ले लिया. वहीं जब पृथ्वीराज के मरने की खबर  संयोगिता ने सुनी तो उसने भी अपने प्राण ले लिए. अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहरी क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान की समाधि आज भी  है, अफगानिस्तान में 800 साल से राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की समाधि को शैतान बताकर और उस पर जूते मारकर अपमानित करते थे, जिसके बाद भारत सरकार ने उनकी अस्थियां भारत मंगवाने का फैसला किया था.

बता दें, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों की नजरों में मोहम्मद गोरी हीरो बना हुआ है. जबकि पृथ्वीराज चौहान को अपना दुश्मन मानते हैं. चुकी पृथ्वीराज चौहान ने गोरी की हत्या की थी. यही वजह है कि पृथ्वीराज चौहान की समाधी को वे लोग तिरस्कार भरी नजरों से देखते हैं.

mahabharat untold story

महल की घटना के बाद, पांडव एक जंगल में गए। लंबे समय तक चलने के बाद, वे जंगल के उस हिस्से में आए जहां एक हिडि़म नाम का दानव और उनकी बहन हिडिम्बा रहते थे।

कुंती और पांडव थके हुए थे और सब सो गए भीम जाग रहा था और कोई खतरा ना रहे उस पर नजर रख रहा था। हिडिम और हिडिम्बा ने मनुष्यों की गंध महसूस की और उसके बाद हिडिम ने हिडिम्बा को वहा जाने के लिए कहा। जैसे ही हिडिम्बा ने भव्य भीमा को देखा, वह उसके साथ प्यार में गिर गई। उसने एक सुंदर महिला का रूप ले लिया और उसके पास गया उसने कहा, मैं हिडिम्बा हूं, मेरा भाई एक राक्षस है, वह आप सब खाएगा। भीमा ने मुस्कुरा दी और कहा, चिंता मत करो, मैं अपने भाई को हराने के लिए काफी मजबूत हूं।

जब हिडिम्बा लंबे समय तक वापस नहीं आया, तो हिडि़ंब ने उसे खोजकर देखा और भीम से बात करते देखा। हिडि़ंब ने गुस्से से कहा के मैंने तुम्हें मानव को मारने के लिए भेजा है और तुम उससे बात कर रही हैं। मैं उसे खुद मार दूंगा। ऐसा कहकर, उन्होंने भीम पर हमला किया भीम और हिडि़ंब के साथ एक भयंकर लड़ाई हुई जिसमे भीम ने हिडि़ंब को मार दिया गड़गड़ाहट से चार पांडवों और कुंती जाग गए। हिडिम्बा ने उन्हें बताया कि वह एक राक्षसी थी और भीम से शादी करने की कामना की थी। कुंती की अनुमति के साथ शादी हुई। कुछ समय बाद हिडिम्बा ने एक बेटा को जन्म दिया जिसे घोटोकचा नाम दिया गया था।

कुछ वर्षों के बाद, कुंती और पांडव ने हिडिम्बा और घाटोकचका छोड़ने का फैसला किया, जो एक मजबूत लड़का बन गया था। पांडवों ने हिडिम्बा से वादा किया कि जब भी उन्हें उनकी ज़रूरत होती है, वे उनके पास आएंगे।

Thursday, 25 March 2021

jai baan toop story

इस तोप से निकले गोले ने धरती को फाड़कर बना दिया था तालाब, नाम से ही कांप जाते थे 

नई दिल्ली। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश का इतिहास जितना शक्तिशाली है, उतना ही समृद्ध हमारे देश के राजा-महाराजाओं की गौरव-गाथा भी है। आज हम आपको राजा सिंह द्वारा बनाए गए जयगढ़ के किले की एक बेहद ही खास चीज़ से रूबरू कराने जा रहे हैं। दरअसल आज हम आपको जयबाण तोप के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इस किले के डूंगर दरवाजे पर रखा हुआ है। इस तोप की कुल लंबाई करीब 32 फीट है। जयबाण तोप के बारे में कहा जाता है कि यह एशिया का सबसे बड़ी तोप है।

50 टन वज़नी यह तोप 35 किलोमीटर की दूरी पर खड़े अपने दुश्मनों के चीथड़े-चीथड़े करने में माहिर थी। जयबाण तोप की शक्ति का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इससे एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर खर्च हो जाता था। जयबाण तोप के बारे में चाकसू का किस्सा सबसे यादगार है। जयपुर से करीब 35 किमी दूर स्थित इस कस्बे में जयबाण तोप से निकला एक गोला आ गिरा था। जिस जगह पर वह गोला गिरा था, वहां इतना बड़ा गड्ढा हो गया कि एक तालाब बन गया था।

इस तोप में इस्तेमाल किए जाने वाले गोले बनाने के लिए भी एक खास तरह का उपकरण इस्तेमाल किया जाता था। जयबाण में इतनी जगह है कि उसमें 8 मीटर लंबे बैरल भी आसानी से रखे जा सकते थे। जयबाण के बारे में इतिहासकारों का कहना है कि असाधारण वज़न होने की वजह से ये कभी किले से बाहर नहीं निकल पाया। इतना ही नहीं इसका इस्तेमाल कभी भी किसी युद्ध में नहीं किया गया था। जयगढ़ किले में मौजूद जयबाण तोप के बारे में आपको वहां सभी जानकारियां मिल जाएगी। अरावली की पहाड़ियों में बसा देश का एतिहासिक जयगढ़ किला साल 1726 में बना था। यह किला बाहर से देखने में जितना शानदार है, अंदर से इसका नज़ारा उतना ही ज़बरदस्त है।

Wednesday, 10 March 2021

Codex gigas haunted book

आज हम आपको एक ऐसी किताब के बारे में बताने वाले हैं जो शैतान द्वारा लिखीं गई है और वो भी सिर्फ एक रात में!! जानकर चौंक गए ना, तो आइये दोस्तों अब हम जानते हैं, इसके पीछे का रहस्य। आज में जिस किताब की बात करने वाला हूं उस किताब का नाम है “कोडेक्स गिगास”.जिसे शैतान की बाइबल भी कहा जाता है। Codex Gigas के रहस्य को जानकर खुद वैज्ञानिक भी हैरान हैं।इस किताब को 13 वी शताब्दी में बोहेमिया में बनाया गया था। इस किताब की खास बात यह है कि ये किताब 160 प्रकार के चमड़े के उपर लिखीं गई है। आखिर ये कैसे मुमकिन है? ये करना इंसान के बस की बात नहीं है। और वो भी उस वक्त जब कोई प्रसाधन नहीं थे। ये किताब देखने भी काफ़ी बड़ी है। कोडेक्स गिगास का वजन करीब 74.8 किलोग्राम हैं। इसे उठाने के लिए कम से कम दो लोगों की जरूर पडती है।

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1877 में Codex Gigas को स्टोकहोम स्वीडन के राष्ट्रीय पुस्तकालय में संग्रहित किया ग या है। इसे दुनिया में सबसे बड़ा मौजूदा मध्ययुगीन प्रकाशित पांडुलिपि, 92 सेमी की लंबाई में है।  शैतान के बहुत ही असामान्य पूर्ण-पृष्ठ चित्र और इसकी रचना के कारण इसे बेहद ही अजीब माना जाता है। 16 वीं शताब्दी के अंत में, कोडेक्स को हैब्सबर्ग शासक रूडोल्फ II के संग्रह में शामिल किया गया था।  तीस साल के युद्ध (1648) के अंत में प्राग के स्वीडिश घेराबंदी के दौरान, पांडुलिपि को युद्ध लूट के रूप में लिया गया और स्टॉकहोम में स्थानांतरित कर दिया गया।

 किताब को किसने लिखा था? और क्यों?

पौराणिक कथा के अनुसार इस पांडुलिपि को शैतान के साथ ऐक समझोते से बनाई गई थीं। 

हुआ यूं था कि हरमन द रिक्ल्यूज नामक एक भिक्षु को इसे बनाने का आदेश दिया गया है। क्योंकि मठ वालों ने मठ की प्रतिज्ञा को तोडने के लिए हरमन को मौत की सजा सुनाई थी। लेकिन उसने कहा कि मुझसे गलती हो गई और इतनी बड़ी सजा तुम नहीं दे सकते। तो मठाधीशों ने ये फैसला किया कि इसे पांडुलिपि की किताब लिखने को दी जाए और वो भी एक ही दिन में। लेकिन एक दिन में पूरी किताब लिखना असंभव है। और मठवालों ने ये भी कहा कि अगर भिक्षु ये नहीं कर पाता तो उसे मौत की सजा मिलेगी।

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निराश होकर भिक्षु ने शैतान का आह्वान किया और शैतान को बुलाया। शैतान जब प्रगट हुआ तो उसने कहा कि क्या चाहीये बोलों, तुम्हारी जो भी इच्छा होगी वो में पूरी करुंगा लेकिन बदले में मुझे तुम्हारी आत्मा चाहिए। भिक्षु ने हाँ कहकर शैतान से समझोता कर लिया। फिर उसके बाद उसी रात में शैतान ने पूरी किताब जानवर के खाल से बने पतों पर लिख दी। उसके बाद सुबह भिक्षु ने उस किताब को मठवालों को दे दी। वो लोग समज नहीं पाए कि कैसे भिक्षु ने एक ही रात में ये किताब लिख दी। लेकिन उस दिन के बाद भिक्षु को सजा से मुक्ति मिल गई। इस किताब में शैतान के कई चित्रों को चित्रित किया गया है। इस किताब में भूत प्रेत, जादू के मंत्र,बोहेमियन लोगों की सूची और वहां के संतो द्वारा दिए गए सूचन लिखें गयें है।

यह 13 वीं शताब्दी की शुरुआत में बोहेमिया में पोदलाज़िस के बेनेडिक्टिन मठ में बनाया गया था, जो आधुनिक चेक गणराज्य में एक क्षेत्र है। इसमें पूरा वुलगेट बाइबिल और अन्य लोकप्रिय रचनाएँ शामिल हैं, जो सभी लैटिन में लिखी गई हैं। ओल्ड एंड न्यू टेस्टामेंट्स के बीच अन्य लोकप्रिय मध्ययुगीन संदर्भ कार्यों का चयन होता है: जोसेफस की एंटीक्विटीज ऑफ द यहूदियों और डी बेलो आयोडिको, सेविले के एन्साइक्लोपीडिया ईटमोलोगिया के कोसिड, कोस्मस ऑफ प्राग, और चिकित्सा कार्य; ये अर्स मेडिसिन के ग्रंथों का एक प्रारंभिक संस्करण हैं, और कॉन्स्टेंटाइन द अफ्रीकन की दो पुस्तकें हैं।

अंततः प्राग में रुडोल्फ II की शाही लाइब्रेरी के लिए अपना रास्ता तलाशते हुए, पूरे संग्रह को तीस साल के युद्ध के दौरान 1648 में स्वीडिश द्वारा युद्ध की लूट के रूप में लिया गया था, और पांडुलिपि अब स्टॉकहोम में स्वीडन के नेशनल लाइब्रेरी में संरक्षित है। यह आम जनता के लिए प्रदर्शन पर है।

बहुत बड़े प्रबुद्ध बाईबिल रोमनस्क्यू मठवासी पुस्तक उत्पादन की एक विशिष्ट विशेषता थे, लेकिन इस समूह के भीतर भी कोडेक्स गिगास का पृष्ठ-आकार असाधारण है।

Friday, 5 February 2021

kulbhata real ghost story

चुड़ैल की वजह से एक रात में खाली हुआ गांव ! 250 साल से इस रास्ते से कोई नहीं गुजरा

 

जैसलमेर से कुछ ही किलोमीटर की दुरी पर एक गाँव बसा हुआ है.

इस गाँव को जाने वाले सभी रास्ते कभी खोल दिए जाते हैं तो कभी सील हो जाते हैं.

रात के समय तो यहाँ जाना बिलकुल मना है. शाम होने से पहले ही गाँव को जाने वाले सभी रास्ते सील कर दिए जाते हैं. अगर कोई व्यक्ति भूल से अन्दर रह जाता है तो उसकी सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं लेता है.

हम बात कर रहे हैं कुलभाटा गाँव की.

राजस्थान का यह एक ऐसा गाँव है जहाँ कोई भी नहीं रहता है. कहते हैं कि सालों पहले यह गाँव एक भरा पूरा गाँव था. चारों तरफ खुशहाली ही थी. लेकिन फिर गाँव पर एक चुड़ैल का हमला हुआ और उस हमले की वजह से एक ही रात में पूरा गाँव खाली हो गया था.

आसपास के गाँव वाले बताते हैं कि वह चुड़ैल इसी गाँव में रहती है और आज वह पहले से बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो चुकी है.

कुछ साल पहले इस घटना पर एक फिल्म भी बनी थी. जिसको सच्ची कहानी पर आधारित बताया गया था. लेकिन ऐसे बहुत से केस हो चुके हैं कि इस चुड़ैल ने कुछ लोगों की जान भी ली है.

कई बार यह चुड़ैल पास के गाँव वालों को भी तंग करती है. रात के समय गाँव में कुछ अजीब तरह की आवाजें आती रहती हैं. कई बार कोई महिला रोती रहती है तो कई बार तो घरों के टूटकर गिरने की भी आवाजें आती हैं. लेकिन सुबह वहां कोई भी घर टूटा नहीं मिलता है.

क्या है पूरी कहानी

इस कहानी को कुछ 250 साल पहले की कहानी बताया जाता है.

गाँव के अन्दर अचानक से ही एक चुड़ैल आ गयी थी. इस चुड़ैल को अमर रहने के लिए जवान लड़कियों की बलि चाहिए होती थी तब उस चुड़ैल ने गाँव से एक-एक कर लड़कियों को खत्म करना शुरू कर दिया.

इस चुड़ैल का नाम कालो है. वह चुड़ैल काफी खतरनाक थी. लेकिन एक दिन गाँव वालों ने साहस करते हुए इस चुड़ैल को बाबा की मदद से पकड़ा और उसको जमीन में दफ़न कर दिया.

गाँव वालों को लगा था कि परेशानी शायद अब खत्म हो गयी है. लेकिन यह मात्र उनका भ्रम था. कुछ ही दिनों बाद चुड़ैल वापस आई और इस बार वह बहुत ज्यादा गुस्से में थी. गाँव वालों को अपनी जान बचाते हुए इस गाँव को एक ही रात में खाली करना पड़ा था.

250 साल से सुनसान एक रास्ता

गाँव में एक सड़क है, जहाँ पर कहते हैं कि 250 सालों से कोई नहीं गुजरा है.

कुछ लोग इस रास्ते से जाने की कोशिश भी कर रहे थे लेकिन वह जिन्दा नहीं बचे थे. आज यह गाँव सुनसान पडा हुआ है. आसपास के लोग आये दिन चुड़ैल की हरकतों से वाकिफ रहते हैं.

बेशक आप इस कहानी को काल्पनिक मान सकते हैं लेकिन अगर आपको कहानी पर यकीन ना हो तो आप एक बार पास के गाँव में जाकर इसी प्रमाणिकता को जांच सकते हैं.

लेकिन एक बात तो सच है कि रात के समय आप इस गाँव में रुकने की हिम्मत बिलकुल नहीं कर पायेंगे.

Saturday, 30 January 2021

कहानी अश्वत्थामा की

महाभारत काल का एक व्यक्ति जिसके बारे में यह माना जाता है कि वह आज भी जिंदा है। इस व्यक्ति का नाम है अश्वत्थामा। यह कौरव और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। इसने महाभारत के युद्घ में कौरवों की ओर से युद्घ किया था। लेकिन अपनी एक गलती के कारण इसे एक शाप मिल जिसके कारण यह दुनिया खत्म होने तक जीवित रहेगा और भटकेगा।


अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं
अश्वत्थामा को दुनिया खत्म होने तक भटकने का शाप देने वाले भगवान श्री कृष्ण थे। यह शाप श्री कृष्ण ने इसलिए दिया क्योंकि इसने पाण्डव पुत्रों की हत्या उस समय की थी जब वह सो रहे थे। इसने ब्रह्माशास्त्र से उत्तरा के गर्भ को भी नष्ट कर दिया था। गर्भ में पल रहे शिशु की हत्या से क्रोधित होकर श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को भयानक शाप दिया। अश्वत्थाम के इस घोर पाप का अनुचित लेकिन एक बड़ा कारण था।

अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

महाभारत के युद्घ में द्रोणाचार्य का वध करने के लिए पाण्डवों ने झूठी अफवाह फैला दी कि अश्वत्थामा मर चुका है। इससे द्रोणाचार्य शोक में डूब गए और पाण्डवों ने मौका देखकर द्रोणाचार्य का वध कर दिया। अपने पिता की छल से हुई हत्या का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने पाण्डव पुत्रों की हत्या की। शाप के कारण शिर पर घाव लिए यहां भटक रहा है अश्वत्थामा।

अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

पाण्डवों की हत्या के बाद जब अश्वत्थामा भागा तब भीम ने उसका पीछा किया और अष्टभा क्षेत्र जो वर्तमान में गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा के पास स्थित है। यहां दोनों के बीच गदा युद्घ हुआ। यहां भीम की गदा जमीन से टकराने के कारण एक कुण्ड बन गया है। पास ही में अश्वत्थाम कुंड भी है। यहां लोग मानते हैं कि आज भी रात के समय अश्वत्थामा मार्ग से भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाता है।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

द्रोणनगरी में स्थित टपकेश्वर स्वयंभू शिवलिंग महर्षि द्रोणाचार्य की सिर्फ तपस्थली मानी जाती है। यहीं गरीबी के कारण दूध नहीं मिलने पर अश्वत्थामा ने भगवान से दूध प्राप्ति के लिए छह माह तक कठोर तपस्या की थी। अश्वत्थामा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दूध प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और पहली बार अश्वत्थामा ने दूध का स्वाद चखा।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

अश्वत्थामा के बारे में इतनी बात जानने के बाद आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि अश्वत्थामा का नाम कैसे पड़ा। इसकी एक बड़ी रोचक कथा है। अश्वत्थामा ने जब जन्म लिया तब उसने अश्व के समान घोर शब्द किया। इसके बाद आकाशवाणी हुई कि यह बालक अश्‍वत्थामा के नाम से प्रसिद्घ होगा।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाल

अश्वत्थामा के सिर पर जन्म से ही एक मणि मौजूद था। द्रौपदी ने अर्जुन की प्रार्थना पर गुरु पुत्र को प्राण दान दे दिया लेकिन सजा के तौर पर मणि छिन लिया और उसके बाल काट लिए। उन दिनों बाल काट लेने का मतलब मृत्युदंड माना जाता था।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

मध्यप्रदेश में महू से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित विंध्यांचल की पहाड़ियों पर खोदरा महादेव विराजमान हैं। माना जाता है कि यह अश्वत्थामा की तपस्थली है। ऐसी मान्यता है कि आज भी अश्वत्थामा यहां आते हैं।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

महाभारत युद्घ समाप्त होने के बाद कौरवों की ओर से सिर्फ तीन योद्घा बचे थे कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा। कृप हस्तिनापुर चले आए और कृतवर्मा द्वारिका। शाप से दुःखी अश्वत्थामा को व्यास मुनि ने शरण दिया। मध्यप्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड के वनों में आज भी अश्वत्थामा को देखे जाने की चर्चाएं आती रहती है।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

मध्यप्रदेश के असीरगढ़ के किले में एक प्राचीन शिव मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर में हर दिन कौन गुलाल और फूल अर्पित करके चला जाता है यह एक रहस्य है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर तक आने का एक गुप्त रास्ता है जिससे अश्वत्थामा आकर यहां शिव जी की पूजा कर जाता है।


कहानी गोविंद देव जी की

Shri Radha Govind Dev Ji


जयपुर। पांच हजार साल पहले भगवान श्री कृष्ण के प्रपोत्र व मथुरा नरेश ब्रजनाभ की बनवाई गई गोविंद देवजी की मूर्ति ने जयपुर को भी वृंदावन बना दिया। राधारानी और दो सखियों के संग विराजे गोविंददेव जी को कनक वृंदावन से सिटी पैलेस परिसर के सूरज महल में विराजमान किया गया। औरंगजेब के दौर में देवालयों को तोडऩे के दौरान चैतन्य महाप्रभु के शिष्य शिवराम गोस्वामी राधा गोविंद को वृंदावन से बैलगाड़ी में बैठाकर सबसे पहले सांगानेर के गोविंदपुरा पहुंचे थे।

आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में राधा गोविंद का भव्य मंदिर बनवाने के बाद गोविंदपुरा को गोविंददेवजी की जागीर में दे दिया था। जयसिंह द्वितीय ने जयपुर बसाया तब राधा गोविंद जी को सिटी पैलेस के सूरज महल में ले आए। राधा गोविंद देव जी के वृंदावन से जयपुर में विराजमान होने के बाद ब्रज क्षेत्र में राधा कृष्ण की भक्ति का प्रचार करने वाले कई सम्प्रदायों के पीठ भी यहां आ गए।

Shri Radha Govind Dev Ji

 

मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में बनवाया मंदिर
करीब पांच हजार साल पहले बनी गोविंददेवजी और पुरानी बस्ती की गोपीनाथजी की मूर्तियों को करीब 480 साल पहले चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी आदि ने वृंदावन के गोमा टीले में से निकाला था। आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में मंदिर बनवाया। मंदिर निर्माण के लिए आमेर से कल्याणदास, माणिकचन्द चौपड़ा, विमलदास आदि कारीगरों को वृंदावन भेजा गया। राधा रानी को भी उड़ीसा से लाकर गोविंद के साथ विराजित किया गया। गोविंद के जयपुर आने पर राधा माधव गौड़ीय परम्परा में राधा दामोदर और गोपीनाथजी आदि के मंदिर बने जिनमें गोविंद भक्ति की रसधारा बहने लगी।


विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में
देवर्षि कलानाथ शास्त्री के मुताबिक चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के संत जयपुर को दूसरा वृंदावन भी मानते हैं। निम्बार्क संतों ने परशुरामद्वारा को निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ बनाया। ब्रह्मपुरी में गोकुलनाथ जी मंदिर और परशुरामद्वारा में बलदेव कृष्ण का मंदिर निम्बार्क सम्प्रदाय का है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने निम्बार्क आचार्यो की सलाह पर विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में सम्पन्न कराया।

वृंदावन से आई लाडलीजी

श्रीनाथजी का बल्लभ सम्प्रदाय, हित हरिवंशीय समाज, शुक व ललित सम्प्रदाय की परम्परा के संतों ने राधा कृष्ण भक्ति की अलख जगाई। आठ प्रिय सखियों संग वृंदावन से आई लाडलीजी (राधारानी) का रामगंज में मंदिर बना। भागवत पुराण में नंदबाबा के संग श्री कृष्ण के आमेर में अम्बिका वन आने के प्रसंग ने भी जयपुर में कृष्ण भक्ति को बढ़ाया।

 

मीरा की कृष्ण प्रतिमा की जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना
चितौडगढ़ के किले में मीरा की कृष्ण प्रतिमा को वर्ष 1656 में आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना से भी कृष्ण भक्ति ऊंचाइयों पर पहुंची। पंडित युगल किशोर शास्त्री के प्रेम भाया मंडल के ढूढाड़ी भजन आज भी बुजुर्गो की जबान पर है।