Thursday, 25 March 2021

jai baan toop story

इस तोप से निकले गोले ने धरती को फाड़कर बना दिया था तालाब, नाम से ही कांप जाते थे 

नई दिल्ली। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश का इतिहास जितना शक्तिशाली है, उतना ही समृद्ध हमारे देश के राजा-महाराजाओं की गौरव-गाथा भी है। आज हम आपको राजा सिंह द्वारा बनाए गए जयगढ़ के किले की एक बेहद ही खास चीज़ से रूबरू कराने जा रहे हैं। दरअसल आज हम आपको जयबाण तोप के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इस किले के डूंगर दरवाजे पर रखा हुआ है। इस तोप की कुल लंबाई करीब 32 फीट है। जयबाण तोप के बारे में कहा जाता है कि यह एशिया का सबसे बड़ी तोप है।

50 टन वज़नी यह तोप 35 किलोमीटर की दूरी पर खड़े अपने दुश्मनों के चीथड़े-चीथड़े करने में माहिर थी। जयबाण तोप की शक्ति का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इससे एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर खर्च हो जाता था। जयबाण तोप के बारे में चाकसू का किस्सा सबसे यादगार है। जयपुर से करीब 35 किमी दूर स्थित इस कस्बे में जयबाण तोप से निकला एक गोला आ गिरा था। जिस जगह पर वह गोला गिरा था, वहां इतना बड़ा गड्ढा हो गया कि एक तालाब बन गया था।

इस तोप में इस्तेमाल किए जाने वाले गोले बनाने के लिए भी एक खास तरह का उपकरण इस्तेमाल किया जाता था। जयबाण में इतनी जगह है कि उसमें 8 मीटर लंबे बैरल भी आसानी से रखे जा सकते थे। जयबाण के बारे में इतिहासकारों का कहना है कि असाधारण वज़न होने की वजह से ये कभी किले से बाहर नहीं निकल पाया। इतना ही नहीं इसका इस्तेमाल कभी भी किसी युद्ध में नहीं किया गया था। जयगढ़ किले में मौजूद जयबाण तोप के बारे में आपको वहां सभी जानकारियां मिल जाएगी। अरावली की पहाड़ियों में बसा देश का एतिहासिक जयगढ़ किला साल 1726 में बना था। यह किला बाहर से देखने में जितना शानदार है, अंदर से इसका नज़ारा उतना ही ज़बरदस्त है।

Wednesday, 10 March 2021

Codex gigas haunted book

आज हम आपको एक ऐसी किताब के बारे में बताने वाले हैं जो शैतान द्वारा लिखीं गई है और वो भी सिर्फ एक रात में!! जानकर चौंक गए ना, तो आइये दोस्तों अब हम जानते हैं, इसके पीछे का रहस्य। आज में जिस किताब की बात करने वाला हूं उस किताब का नाम है “कोडेक्स गिगास”.जिसे शैतान की बाइबल भी कहा जाता है। Codex Gigas के रहस्य को जानकर खुद वैज्ञानिक भी हैरान हैं।इस किताब को 13 वी शताब्दी में बोहेमिया में बनाया गया था। इस किताब की खास बात यह है कि ये किताब 160 प्रकार के चमड़े के उपर लिखीं गई है। आखिर ये कैसे मुमकिन है? ये करना इंसान के बस की बात नहीं है। और वो भी उस वक्त जब कोई प्रसाधन नहीं थे। ये किताब देखने भी काफ़ी बड़ी है। कोडेक्स गिगास का वजन करीब 74.8 किलोग्राम हैं। इसे उठाने के लिए कम से कम दो लोगों की जरूर पडती है।

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1877 में Codex Gigas को स्टोकहोम स्वीडन के राष्ट्रीय पुस्तकालय में संग्रहित किया ग या है। इसे दुनिया में सबसे बड़ा मौजूदा मध्ययुगीन प्रकाशित पांडुलिपि, 92 सेमी की लंबाई में है।  शैतान के बहुत ही असामान्य पूर्ण-पृष्ठ चित्र और इसकी रचना के कारण इसे बेहद ही अजीब माना जाता है। 16 वीं शताब्दी के अंत में, कोडेक्स को हैब्सबर्ग शासक रूडोल्फ II के संग्रह में शामिल किया गया था।  तीस साल के युद्ध (1648) के अंत में प्राग के स्वीडिश घेराबंदी के दौरान, पांडुलिपि को युद्ध लूट के रूप में लिया गया और स्टॉकहोम में स्थानांतरित कर दिया गया।

 किताब को किसने लिखा था? और क्यों?

पौराणिक कथा के अनुसार इस पांडुलिपि को शैतान के साथ ऐक समझोते से बनाई गई थीं। 

हुआ यूं था कि हरमन द रिक्ल्यूज नामक एक भिक्षु को इसे बनाने का आदेश दिया गया है। क्योंकि मठ वालों ने मठ की प्रतिज्ञा को तोडने के लिए हरमन को मौत की सजा सुनाई थी। लेकिन उसने कहा कि मुझसे गलती हो गई और इतनी बड़ी सजा तुम नहीं दे सकते। तो मठाधीशों ने ये फैसला किया कि इसे पांडुलिपि की किताब लिखने को दी जाए और वो भी एक ही दिन में। लेकिन एक दिन में पूरी किताब लिखना असंभव है। और मठवालों ने ये भी कहा कि अगर भिक्षु ये नहीं कर पाता तो उसे मौत की सजा मिलेगी।

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निराश होकर भिक्षु ने शैतान का आह्वान किया और शैतान को बुलाया। शैतान जब प्रगट हुआ तो उसने कहा कि क्या चाहीये बोलों, तुम्हारी जो भी इच्छा होगी वो में पूरी करुंगा लेकिन बदले में मुझे तुम्हारी आत्मा चाहिए। भिक्षु ने हाँ कहकर शैतान से समझोता कर लिया। फिर उसके बाद उसी रात में शैतान ने पूरी किताब जानवर के खाल से बने पतों पर लिख दी। उसके बाद सुबह भिक्षु ने उस किताब को मठवालों को दे दी। वो लोग समज नहीं पाए कि कैसे भिक्षु ने एक ही रात में ये किताब लिख दी। लेकिन उस दिन के बाद भिक्षु को सजा से मुक्ति मिल गई। इस किताब में शैतान के कई चित्रों को चित्रित किया गया है। इस किताब में भूत प्रेत, जादू के मंत्र,बोहेमियन लोगों की सूची और वहां के संतो द्वारा दिए गए सूचन लिखें गयें है।

यह 13 वीं शताब्दी की शुरुआत में बोहेमिया में पोदलाज़िस के बेनेडिक्टिन मठ में बनाया गया था, जो आधुनिक चेक गणराज्य में एक क्षेत्र है। इसमें पूरा वुलगेट बाइबिल और अन्य लोकप्रिय रचनाएँ शामिल हैं, जो सभी लैटिन में लिखी गई हैं। ओल्ड एंड न्यू टेस्टामेंट्स के बीच अन्य लोकप्रिय मध्ययुगीन संदर्भ कार्यों का चयन होता है: जोसेफस की एंटीक्विटीज ऑफ द यहूदियों और डी बेलो आयोडिको, सेविले के एन्साइक्लोपीडिया ईटमोलोगिया के कोसिड, कोस्मस ऑफ प्राग, और चिकित्सा कार्य; ये अर्स मेडिसिन के ग्रंथों का एक प्रारंभिक संस्करण हैं, और कॉन्स्टेंटाइन द अफ्रीकन की दो पुस्तकें हैं।

अंततः प्राग में रुडोल्फ II की शाही लाइब्रेरी के लिए अपना रास्ता तलाशते हुए, पूरे संग्रह को तीस साल के युद्ध के दौरान 1648 में स्वीडिश द्वारा युद्ध की लूट के रूप में लिया गया था, और पांडुलिपि अब स्टॉकहोम में स्वीडन के नेशनल लाइब्रेरी में संरक्षित है। यह आम जनता के लिए प्रदर्शन पर है।

बहुत बड़े प्रबुद्ध बाईबिल रोमनस्क्यू मठवासी पुस्तक उत्पादन की एक विशिष्ट विशेषता थे, लेकिन इस समूह के भीतर भी कोडेक्स गिगास का पृष्ठ-आकार असाधारण है।

Friday, 5 February 2021

kulbhata real ghost story

चुड़ैल की वजह से एक रात में खाली हुआ गांव ! 250 साल से इस रास्ते से कोई नहीं गुजरा

 

जैसलमेर से कुछ ही किलोमीटर की दुरी पर एक गाँव बसा हुआ है.

इस गाँव को जाने वाले सभी रास्ते कभी खोल दिए जाते हैं तो कभी सील हो जाते हैं.

रात के समय तो यहाँ जाना बिलकुल मना है. शाम होने से पहले ही गाँव को जाने वाले सभी रास्ते सील कर दिए जाते हैं. अगर कोई व्यक्ति भूल से अन्दर रह जाता है तो उसकी सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं लेता है.

हम बात कर रहे हैं कुलभाटा गाँव की.

राजस्थान का यह एक ऐसा गाँव है जहाँ कोई भी नहीं रहता है. कहते हैं कि सालों पहले यह गाँव एक भरा पूरा गाँव था. चारों तरफ खुशहाली ही थी. लेकिन फिर गाँव पर एक चुड़ैल का हमला हुआ और उस हमले की वजह से एक ही रात में पूरा गाँव खाली हो गया था.

आसपास के गाँव वाले बताते हैं कि वह चुड़ैल इसी गाँव में रहती है और आज वह पहले से बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो चुकी है.

कुछ साल पहले इस घटना पर एक फिल्म भी बनी थी. जिसको सच्ची कहानी पर आधारित बताया गया था. लेकिन ऐसे बहुत से केस हो चुके हैं कि इस चुड़ैल ने कुछ लोगों की जान भी ली है.

कई बार यह चुड़ैल पास के गाँव वालों को भी तंग करती है. रात के समय गाँव में कुछ अजीब तरह की आवाजें आती रहती हैं. कई बार कोई महिला रोती रहती है तो कई बार तो घरों के टूटकर गिरने की भी आवाजें आती हैं. लेकिन सुबह वहां कोई भी घर टूटा नहीं मिलता है.

क्या है पूरी कहानी

इस कहानी को कुछ 250 साल पहले की कहानी बताया जाता है.

गाँव के अन्दर अचानक से ही एक चुड़ैल आ गयी थी. इस चुड़ैल को अमर रहने के लिए जवान लड़कियों की बलि चाहिए होती थी तब उस चुड़ैल ने गाँव से एक-एक कर लड़कियों को खत्म करना शुरू कर दिया.

इस चुड़ैल का नाम कालो है. वह चुड़ैल काफी खतरनाक थी. लेकिन एक दिन गाँव वालों ने साहस करते हुए इस चुड़ैल को बाबा की मदद से पकड़ा और उसको जमीन में दफ़न कर दिया.

गाँव वालों को लगा था कि परेशानी शायद अब खत्म हो गयी है. लेकिन यह मात्र उनका भ्रम था. कुछ ही दिनों बाद चुड़ैल वापस आई और इस बार वह बहुत ज्यादा गुस्से में थी. गाँव वालों को अपनी जान बचाते हुए इस गाँव को एक ही रात में खाली करना पड़ा था.

250 साल से सुनसान एक रास्ता

गाँव में एक सड़क है, जहाँ पर कहते हैं कि 250 सालों से कोई नहीं गुजरा है.

कुछ लोग इस रास्ते से जाने की कोशिश भी कर रहे थे लेकिन वह जिन्दा नहीं बचे थे. आज यह गाँव सुनसान पडा हुआ है. आसपास के लोग आये दिन चुड़ैल की हरकतों से वाकिफ रहते हैं.

बेशक आप इस कहानी को काल्पनिक मान सकते हैं लेकिन अगर आपको कहानी पर यकीन ना हो तो आप एक बार पास के गाँव में जाकर इसी प्रमाणिकता को जांच सकते हैं.

लेकिन एक बात तो सच है कि रात के समय आप इस गाँव में रुकने की हिम्मत बिलकुल नहीं कर पायेंगे.

Saturday, 30 January 2021

कहानी अश्वत्थामा की

महाभारत काल का एक व्यक्ति जिसके बारे में यह माना जाता है कि वह आज भी जिंदा है। इस व्यक्ति का नाम है अश्वत्थामा। यह कौरव और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। इसने महाभारत के युद्घ में कौरवों की ओर से युद्घ किया था। लेकिन अपनी एक गलती के कारण इसे एक शाप मिल जिसके कारण यह दुनिया खत्म होने तक जीवित रहेगा और भटकेगा।


अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं
अश्वत्थामा को दुनिया खत्म होने तक भटकने का शाप देने वाले भगवान श्री कृष्ण थे। यह शाप श्री कृष्ण ने इसलिए दिया क्योंकि इसने पाण्डव पुत्रों की हत्या उस समय की थी जब वह सो रहे थे। इसने ब्रह्माशास्त्र से उत्तरा के गर्भ को भी नष्ट कर दिया था। गर्भ में पल रहे शिशु की हत्या से क्रोधित होकर श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को भयानक शाप दिया। अश्वत्थाम के इस घोर पाप का अनुचित लेकिन एक बड़ा कारण था।

अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

महाभारत के युद्घ में द्रोणाचार्य का वध करने के लिए पाण्डवों ने झूठी अफवाह फैला दी कि अश्वत्थामा मर चुका है। इससे द्रोणाचार्य शोक में डूब गए और पाण्डवों ने मौका देखकर द्रोणाचार्य का वध कर दिया। अपने पिता की छल से हुई हत्या का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने पाण्डव पुत्रों की हत्या की। शाप के कारण शिर पर घाव लिए यहां भटक रहा है अश्वत्थामा।

अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

पाण्डवों की हत्या के बाद जब अश्वत्थामा भागा तब भीम ने उसका पीछा किया और अष्टभा क्षेत्र जो वर्तमान में गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा के पास स्थित है। यहां दोनों के बीच गदा युद्घ हुआ। यहां भीम की गदा जमीन से टकराने के कारण एक कुण्ड बन गया है। पास ही में अश्वत्थाम कुंड भी है। यहां लोग मानते हैं कि आज भी रात के समय अश्वत्थामा मार्ग से भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाता है।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

द्रोणनगरी में स्थित टपकेश्वर स्वयंभू शिवलिंग महर्षि द्रोणाचार्य की सिर्फ तपस्थली मानी जाती है। यहीं गरीबी के कारण दूध नहीं मिलने पर अश्वत्थामा ने भगवान से दूध प्राप्ति के लिए छह माह तक कठोर तपस्या की थी। अश्वत्थामा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दूध प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और पहली बार अश्वत्थामा ने दूध का स्वाद चखा।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

अश्वत्थामा के बारे में इतनी बात जानने के बाद आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि अश्वत्थामा का नाम कैसे पड़ा। इसकी एक बड़ी रोचक कथा है। अश्वत्थामा ने जब जन्म लिया तब उसने अश्व के समान घोर शब्द किया। इसके बाद आकाशवाणी हुई कि यह बालक अश्‍वत्थामा के नाम से प्रसिद्घ होगा।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाल

अश्वत्थामा के सिर पर जन्म से ही एक मणि मौजूद था। द्रौपदी ने अर्जुन की प्रार्थना पर गुरु पुत्र को प्राण दान दे दिया लेकिन सजा के तौर पर मणि छिन लिया और उसके बाल काट लिए। उन दिनों बाल काट लेने का मतलब मृत्युदंड माना जाता था।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

मध्यप्रदेश में महू से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित विंध्यांचल की पहाड़ियों पर खोदरा महादेव विराजमान हैं। माना जाता है कि यह अश्वत्थामा की तपस्थली है। ऐसी मान्यता है कि आज भी अश्वत्थामा यहां आते हैं।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

महाभारत युद्घ समाप्त होने के बाद कौरवों की ओर से सिर्फ तीन योद्घा बचे थे कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा। कृप हस्तिनापुर चले आए और कृतवर्मा द्वारिका। शाप से दुःखी अश्वत्थामा को व्यास मुनि ने शरण दिया। मध्यप्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड के वनों में आज भी अश्वत्थामा को देखे जाने की चर्चाएं आती रहती है।
अमर अश्वत्थामा के यह दस रहस्य चौंकाने वाले हैं

मध्यप्रदेश के असीरगढ़ के किले में एक प्राचीन शिव मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर में हर दिन कौन गुलाल और फूल अर्पित करके चला जाता है यह एक रहस्य है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर तक आने का एक गुप्त रास्ता है जिससे अश्वत्थामा आकर यहां शिव जी की पूजा कर जाता है।


कहानी गोविंद देव जी की

Shri Radha Govind Dev Ji


जयपुर। पांच हजार साल पहले भगवान श्री कृष्ण के प्रपोत्र व मथुरा नरेश ब्रजनाभ की बनवाई गई गोविंद देवजी की मूर्ति ने जयपुर को भी वृंदावन बना दिया। राधारानी और दो सखियों के संग विराजे गोविंददेव जी को कनक वृंदावन से सिटी पैलेस परिसर के सूरज महल में विराजमान किया गया। औरंगजेब के दौर में देवालयों को तोडऩे के दौरान चैतन्य महाप्रभु के शिष्य शिवराम गोस्वामी राधा गोविंद को वृंदावन से बैलगाड़ी में बैठाकर सबसे पहले सांगानेर के गोविंदपुरा पहुंचे थे।

आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में राधा गोविंद का भव्य मंदिर बनवाने के बाद गोविंदपुरा को गोविंददेवजी की जागीर में दे दिया था। जयसिंह द्वितीय ने जयपुर बसाया तब राधा गोविंद जी को सिटी पैलेस के सूरज महल में ले आए। राधा गोविंद देव जी के वृंदावन से जयपुर में विराजमान होने के बाद ब्रज क्षेत्र में राधा कृष्ण की भक्ति का प्रचार करने वाले कई सम्प्रदायों के पीठ भी यहां आ गए।

Shri Radha Govind Dev Ji

 

मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में बनवाया मंदिर
करीब पांच हजार साल पहले बनी गोविंददेवजी और पुरानी बस्ती की गोपीनाथजी की मूर्तियों को करीब 480 साल पहले चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी आदि ने वृंदावन के गोमा टीले में से निकाला था। आमेर नरेश मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में मंदिर बनवाया। मंदिर निर्माण के लिए आमेर से कल्याणदास, माणिकचन्द चौपड़ा, विमलदास आदि कारीगरों को वृंदावन भेजा गया। राधा रानी को भी उड़ीसा से लाकर गोविंद के साथ विराजित किया गया। गोविंद के जयपुर आने पर राधा माधव गौड़ीय परम्परा में राधा दामोदर और गोपीनाथजी आदि के मंदिर बने जिनमें गोविंद भक्ति की रसधारा बहने लगी।


विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में
देवर्षि कलानाथ शास्त्री के मुताबिक चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के संत जयपुर को दूसरा वृंदावन भी मानते हैं। निम्बार्क संतों ने परशुरामद्वारा को निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ बनाया। ब्रह्मपुरी में गोकुलनाथ जी मंदिर और परशुरामद्वारा में बलदेव कृष्ण का मंदिर निम्बार्क सम्प्रदाय का है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने निम्बार्क आचार्यो की सलाह पर विश्व का सबसे बड़ा अश्वमेघ यज्ञ जयपुर में सम्पन्न कराया।

वृंदावन से आई लाडलीजी

श्रीनाथजी का बल्लभ सम्प्रदाय, हित हरिवंशीय समाज, शुक व ललित सम्प्रदाय की परम्परा के संतों ने राधा कृष्ण भक्ति की अलख जगाई। आठ प्रिय सखियों संग वृंदावन से आई लाडलीजी (राधारानी) का रामगंज में मंदिर बना। भागवत पुराण में नंदबाबा के संग श्री कृष्ण के आमेर में अम्बिका वन आने के प्रसंग ने भी जयपुर में कृष्ण भक्ति को बढ़ाया।

 

मीरा की कृष्ण प्रतिमा की जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना
चितौडगढ़ के किले में मीरा की कृष्ण प्रतिमा को वर्ष 1656 में आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में स्थापना से भी कृष्ण भक्ति ऊंचाइयों पर पहुंची। पंडित युगल किशोर शास्त्री के प्रेम भाया मंडल के ढूढाड़ी भजन आज भी बुजुर्गो की जबान पर है।

story nahargarh fort

भूत के खौफ से रुक गया था इस किले का काम, खास रानियों के लिए बने थे कमरे

आत्मा ने रोका था किले का काम...
- कहा जाता है कि किले के निर्माण के दौरान अजीब घटनाएं सामने आ रहीं थी। हर दूसरे दिन मजदूरों को अपना काम बिगड़ा हुआ मिलता था।
- इसके बाद पता करने पर जानकारी मिली कि य़ह जगह राठौर राजा नाहर सिंह भोमिया की थी। लोगों का मानना था कि उनकी आत्मा की वजह से निर्माण में इस तरह की दिक्कतें सामने आ रही थी।
- जिसके बाद सवाई राजा मान सिंह ने पास के पुराना घाट पर उनके लिए एक छोटा सा महल बनवाया। नाहर सिंह की आत्मा को जगह मिलने के बाद महल के निर्माण में कभी भी गड़बड़ी नहीं आई।
- इस किले का पहले नाम सुदर्शनगढ़ था, लेकिन राठौर राजा नाहर सिंह भोमिया की आत्मा का किस्सा आने के बाद इसका नाम बदलकर नाहरगढ़ कर दिया गया।

अकबर के नौ रत्नों में एक ने बनवाया था ये महल

- अकबर के नौरत्नों में से एक रहे महाराजा मान सिंह ने नाहरगढ़ किले का निर्माण करवाया था। महाराजा मान सिंह ने ही जयपुर की स्थापना भी की थी। सन् 1734 ईसवीं में इस किले का निर्माण करवाया गया।
- अरावली की पहाड़ियों पर बना यह किला आमेर और जयगढ़ किले के साथ मिलकर जयपुर शहर को सुरक्षा देने के हिसाब से बनवाया गया था। इस किले में आमिर खान से लेकर सुशांत सिंह राजपूत की फिल्में शूट हो चुकी हैं।

रानियों के लिए करवाया था शाही भवनों का निर्माण

- राजा मान सिंह की कई रानियां थी, यही वजह थी कि उन्होंने सभी रानियों के लिए शाही कमरे बनवाए थे।
- इसके लिए खास तौर पर आर्किटेक्ट को निर्देश दिए गए थे। इसे बनाने का श्रेय जयधर भट्टाचार्य को जाता है जिन्होंने रानियों ने के भवन का निर्माण किया था।
- रानियों के लिए मानवेन्द्र भवन में एक जैसे कई शाही कमरे बनवाए गए थे। जिनमें टॉयलेट से लेकर किचन तक ही व्यवस्था दी गई थी।

जानवरों का खतरा

इस किले के पीछे काफी बड़ा जंगल है। बताया जाता है कि राजा मानसिंह जंगल का इस्तेमाल शिकार के लिए करते थे। आज भी यहां कई जंगली जानवर मौजूद हैं। यही कारण है कि यहां पर्यटकों को दिन में भी महल या केसर क्यारी(किले का हिस्सा) के आस-पास नहीं घूमने देते।

कहानी सारंगपुर हनुमानजी की

इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव

kashtbhanjan hanuman mandir sarangpur

इस अनोखे मंदिर में महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं शनि देव

शनि देव को सबसे क्रोधित देवता माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी बुरी दृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ जाए तो उसके जीवन में परेशानियां आने लगती है। हमारे हिन्दू ग्रंथों में माना गया है जो भी व्यक्ति भगवान हनुमान जी की भक्ति करता है, उस पर शनि देव का प्रकोप नहीं रहता है। कहा जाता है कि महाबली हनुमान के आगे शनि देव भी कुछ नहीं कर पाते हैं।

आज हम आपको ऐसा मंदिर के बारे में बताएंगे जहां शनि देव महाबली हनुमान जी के चरणों में नारी रूप में हैं। अब सवाल ये भी उठता है कि आखिर वह कौन सा कारण था कि शनि देव को नारी रूप धारण करना पड़ा और महाबली हनुमान जी को चरणों में बैठना पड़ा? भारत में ऐसा मंदिर कहा है? तो अइये जानते हैं....

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार धरती पर शनि देव प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। शनि देव की बुरी दृष्टि से मानव तो मानव देवता भी बहुत परेशान हो गए थे। इसके बाद सभी ने शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए महाबली हनुमान जी को याद किया और उनसे रक्षा की गुहार लगाई। भक्तों की गुहार पर हनुमान जी ने शनि देव को सजा देने के लिए निकल पड़े।

जब इस बात की जानकारी शनि देव को लगी तो वो भयभीत हो गए। क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी के गुस्से से कोई रक्षा नहीं कर पाएगा। कथाओं के अनुसार, शनि देव हनुमान जी के गुस्से बचने के लिए उपाय निकाला और नारी का रूप धारण कर लिया।

सभी जानते हैं कि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं और वे किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठाते, ना ही बुरा बर्ताव करते। बस यही सोच कर शनि देव ने हनुमान जी से बचने के लिए नारी का रूप धराण कर लिए और भगवान हनुमान से उनके चरणों में शरण मांग ली। हनुमान जी को इस बात की जानकारी हो गई थी शनि देव ही स्त्री का रूप धारण किए हुए हैं। इसके बावजूद हनुमान जी ने शनि देव को नारी रूप में माफ कर दिया। उसके बाद शनि देव ने हनुमान जी के भक्तों पर से अपना प्रकोप हटा लिया।

kashtbhanjan hanuman mandir sarangpur

गुजरात के भावनगर में है मंदिर

ऐसा मंदिर गुजरात के भावनगर स्थि सारंगपुर गांव में है। इस प्रचीन हनुमान मंदिर को कष्टभंजन हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में हनुमान जी का दर्शन करने आता है और भक्ति करता है, उसके ऊपर से शनि देव का प्रकोप दूर हो जाता है। माना ये भी जाता है कि शनिदेव हनुमान जी के भक्तों को कभी परेशान नहीं करते हैं।